Thursday, September 17, 2026

चेतना, नियति और स्वतंत्रता की संरचना

 

चेतना, नियति और स्वतंत्रता की संरचना

1. उत्पत्ति का प्रश्न : चेतना या पदार्थ?

मानव चिंतन के सबसे प्राचीन प्रश्नों में से एक आज भी हमारे सामने उतनी ही गहराई के साथ उपस्थित है

चेतना पदार्थ से उत्पन्न हुई, अथवा पदार्थ चेतना के भीतर प्रकट हुआ?

भौतिकवादी दृष्टिकोण सामान्यतः चेतना को पदार्थ का एक उद्भूत गुण (emergent property) मानता है। इस दृष्टि से देखें तो मूलभूत प्राकृतिक नियमों के अधीन संचालित भौतिक प्रक्रियाएँ क्रमशः अधिक जटिल संरचनाओं को जन्म देती गईं। इन जटिल संरचनाओं से अंततः जैविक जीवों का विकास हुआ और उन्हीं के साथ व्यक्तिपरक चेतना का भी उदय हुआ।

जैविक प्रणालियों के क्रमिक विकास की व्याख्या के रूप में यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक रूप से स्वीकार्य हो सकता है। किंतु इसके पीछे एक और अधिक गहरा प्रश्न छिपा हुआ है

जो कुछ अपने आप में केवल वस्तुनिष्ठ है, उससे व्यक्तिपरक अनुभव का जन्म कैसे हुआ?

हम मस्तिष्क को विद्युत गतिविधियों, रासायनिक प्रक्रियाओं, तंत्रिका-जालों और सूचना के प्रसंस्करण के रूप में समझ सकते हैं। हम यह भी देख सकते हैं कि किसी विशेष मानसिक अवस्था के साथ मस्तिष्क की कुछ विशिष्ट गतिविधियाँ जुड़ी होती हैं। किंतु केवल इस सहसंबंध से यह स्पष्ट नहीं होता कि अनुभव का अस्तित्व ही क्यों है।

देखने का अनुभव क्यों है?
महसूस करने का अनुभव क्यों है?
स्मरण करने, इच्छा करने और विचार करने का अनुभव क्यों है?

किसी वस्तु के भीतर होने वाली भौतिक प्रक्रिया और उस प्रक्रिया के अनुभव के बीच जो अंतर है, वही चेतना की सबसे कठिन पहेलियों में से एक है।

इसी कठिनाई को आधुनिक दर्शन में सामान्यतः चेतना की कठिन समस्या” (Hard Problem of Consciousness) कहा जाता है।

एक प्राचीन दार्शनिक अंतर्दृष्टि यहाँ एक और प्रश्न खड़ा करती है। यदि किसी कार्य में उसके कारण से भिन्न कोई मूलभूत गुण उत्पन्न नहीं हो सकता, तो यदि पदार्थ को पूर्णतः जड़ और चेतनारहित माना जाए, चेतना उसमें से आती कहाँ से है?

यह भौतिकवाद का कोई वैज्ञानिक खंडन नहीं है। इतना अवश्य है कि इससे यह स्पष्ट होता है कि चेतना की अंतिम उत्पत्ति का प्रश्न अभी भी दार्शनिक रूप से अनसुलझा है।

यही प्रश्न कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में भी एक नए रूप में सामने आता है। कोई मशीन सूचना का प्रसंस्करण कर सकती है, प्रतिरूपों को पहचान सकती है, भाषा उत्पन्न कर सकती है और अत्यंत जटिल व्यवहार कर सकती है। किंतु व्यवहार की जटिलता अपने आप में व्यक्तिपरक अनुभव का प्रमाण नहीं है। हम बुद्धिमत्ता से जुड़े कार्यों को पुनः उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमने चेतना को समझ लिया है।

अतः मूल रहस्य वहीं बना रहता है

क्या चेतना ब्रह्मांड की एक उपज है, अथवा ब्रह्मांड स्वयं चेतना के भीतर प्रकट होने वाला एक अनुभव है?

2. प्रतिलोम परिकल्पना : चेतना मूलभूत है

अब यदि हम सामान्य धारणा को उलट दें तो?

यदि हम यह मानकर चलें कि पदार्थ मूलभूत नहीं, बल्कि चेतना मूलभूत है?

अद्वैत वेदान्त, विशेषतः उपनिषदों की परंपरा, इस संभावना को अत्यंत गहराई से व्यक्त करती है। छान्दोग्य उपनिषद् कहता है

सर्वं खल्विदं ब्रह्म।

sarvaṁ khalvidaṁ brahma

यह सब वास्तव में ब्रह्म ही है।

छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1

इस छोटे-से वाक्य में एक अत्यंत व्यापक दृष्टि समाहित है।

यदि सब कुछ ब्रह्म है, तो अंतिम वास्तविकता को एक ओर स्वतंत्र रूप से विद्यमान पदार्थ और दूसरी ओर उससे भिन्न चेतना में विभाजित करना कठिन हो जाता है। जिसे हम पदार्थ कहते हैं, जिसे मन कहते हैं, जिसे जीव कहते हैं और जिसे हम समूचा ब्रह्मांड कहते हैंये सभी संभवतः एक ही मूलभूत वास्तविकता की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

ईशावास्य उपनिषद् भी इसी अनुभूति को व्यक्त करता है

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

īśāvāsyam idaṁ sarvaṁ yat kiñca jagatyāṁ jagat

इस परिवर्तनशील जगत् में जो कुछ भी है, वह सब परम सत्ता से व्याप्त है।

इस दृष्टिकोण में चेतना ब्रह्मांड के विकास की अंतिम सीढ़ी पर उत्पन्न होने वाली कोई वस्तु नहीं रह जाती। इसके विपरीत, ब्रह्मांड स्वयं चेतना में प्रकट होने वाली अभिव्यक्ति बन जाता है।

तब प्रश्न भी बदल जाता है।

हमें यह पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि

चेतना पदार्थ से कैसे उत्पन्न हुई?”

बल्कि प्रश्न हो जाता है

पदार्थ चेतना में कैसे प्रकट होता है?”

निश्चित ही दूसरा प्रश्न भी रहस्य से मुक्त नहीं है। किंतु उसमें एक पूर्वधारणा नहीं हैवह चेतना को किसी मूलतः अचेतन सत्ता की द्वितीयक उपज मानकर आरंभ नहीं करता।

3. चेतना और उसकी अभिव्यक्ति के स्तर

यदि चेतना मूलभूत है, तो विभिन्न जीवों में दिखाई देने वाले अंतर का अर्थ यह नहीं कि मूलभूत चेतना स्वयं अलग-अलग मात्रा में विद्यमान है। संभव है कि अंतर केवल इतना हो कि विभिन्न रूप उस चेतना को अभिव्यक्त और प्रतिबिंबित करने में अलग-अलग क्षमता रखते हों।

पत्थर अस्तित्व को प्रकट करता है।

पौधा अस्तित्व के साथ वृद्धि और प्रतिक्रिया को प्रकट करता है।

पशु संवेदना और गति को प्रकट करता है।

मनुष्य चिंतन, आत्म-जागरूकता, स्मृति, कल्पना और विचारपूर्वक चयन की क्षमता को प्रकट करता है।

इसलिए यह कहना अधिक उचित हो सकता है कि पत्थर से मनुष्य तक चेतना स्वयं नहीं बढ़ती, बल्कि चेतना को अभिव्यक्त करने वाले माध्यम की क्षमता बढ़ती जाती है।

यह अंतर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दर्पण उस व्यक्ति को उत्पन्न नहीं करता जिसका प्रतिबिंब उसमें दिखाई देता है। केवल इतना होता है कि स्वच्छ दर्पण प्रतिबिंब को अधिक स्पष्टता से प्रकट करता है।

इसी प्रकार संभव है कि विभिन्न जीव-रूप एक ही मूलभूत चेतना को अलग-अलग स्तरों पर प्रतिबिंबित और अभिव्यक्त करते हों।

हम सामान्यतः मानते हैं कि व्यक्तिगत सूक्ष्म शरीर, अर्थात् जीव, भौतिक शरीर के भीतर कहीं स्थित है। मुझे विश्वास नहीं है कि ऐसा आवश्यक रूप से हो। मेरा विचार है कि जीव शरीर के भीतर स्थित नहीं है। वह भौतिक शरीर से बाहर कहीं विद्यमान हैसंभवतः सौरमंडल में ही कहींऔर शरीर एक ऐसे उपकरण के रूप में कार्य करता है जिसके माध्यम से जीव भौतिक जगत् में कार्य करता और उसका अनुभव करता है।

यह विचार मेरे लिए केवल बौद्धिक कल्पना नहीं है। ध्यान के दौरान, जब मन की सामान्य गतिविधियाँ पर्याप्त रूप से शांत हो जाती हैं, तब कभी-कभी मुझे उस सत्ता की एक झलक मिलती है जिसे मैं अपना वास्तविक स्वरूप मानता हूँ। उस अवस्था में एक स्पष्ट अनुभूति होती है कि अनुभव करने वाला शरीर नहीं है; यहाँ तक कि वह विचारों और मानसिक गतिविधियों की सामान्य धारा भी नहीं है। इसी अनुभव ने मुझे इस संभावना पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है कि जीवात्मावह व्यक्तिगत सत्ता जो अनुभव करती है, महसूस करती है और जागरूक रहती हैभौतिक शरीर के भीतर स्थित नहीं है। शरीर संभवतः केवल वह उपकरण है जिसके माध्यम से जीवात्मा भौतिक जगत् का अनुभव करती है। इसलिए मैं यह अनुमान करता हूँ कि जीवात्मा शरीर की भौतिक सीमाओं से परे विद्यमान है, संभवतः व्यापक सौरमंडल में कहीं, और वहीं से शरीर का संचालन करती है। मैं इसे किसी स्थापित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। यह मेरे ध्यान के अनुभव और अनुभवकर्ता तथा अनुभव के उपकरण के बीच के अंतर की मेरी समझ से निकला हुआ एक अनुमान है।

इस संबंध को केवल एक रूपक के रूप में चालक और वाहन के संबंध से समझा जा सकता है। चालक वाहन नहीं है। वाहन के प्रत्येक यांत्रिक घटक के साथ चालक का भौतिक रूप से अभिन्न होना भी आवश्यक नहीं है। उसी प्रकार चेतना शरीर का उपयोग कर सकती है, बिना स्वयं शरीर के भीतर सीमित हुए।

इस दृष्टि से मस्तिष्क चेतना का अंतिम स्रोत अथवा उसका निवासस्थान होकर वह माध्यम हो सकता है जिसके द्वारा चेतना भौतिक जगत् में स्वयं को अभिव्यक्त करती है।

यदि ऐसा है, तो एक नया प्रश्न उठता हैजीव कहाँ स्थित है?

यह प्रश्न उस प्रश्न से भिन्न है कि चेतना का अनुभव कहाँ होता है।

हम शरीर के माध्यम से चेतना का अनुभव करते हैं। लेकिन इससे यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि चेतना शरीर के भीतर ही स्थित है।

अनुभव का स्थान और उसके स्रोत का स्थान एक ही होना आवश्यक नहीं है।

इस दृष्टि से व्यक्ति और ब्रह्मांड का संबंध भी नए ढंग से दिखाई देता है। जीव शरीर के भीतर बंद कोई पृथक सत्ता नहीं रह जाता; वह एक बहुत बड़ी ब्रह्मांडीय व्यवस्था का सहभागी बन जाता है। शरीर उसका स्थानीय उपकरण है, जबकि उसका व्यापक अस्तित्व जीव की भौतिक सीमाओं से आगे तक विस्तृत हो सकता है।

अधिक जागरूकता व्यक्ति को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र बनाती है। किंतु व्यक्तिगत स्तर पर यह स्वतंत्रता कभी पूर्ण नहीं होती।

प्रत्येक मनुष्य कुछ सीमाओं के भीतर कार्य करता है

  • उसकी जैविक संरचना,
  • उसकी मनोवैज्ञानिक conditioning और संस्कार,
  • उसकी सामाजिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियाँ,
  • उसकी संचित प्रवृत्तियाँ,
  • और वह जिसे भारतीय चिंतन कर्म कहता है।

इसलिए स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं, संदर्भ-निर्भर है।

खेल के मैदान में दौड़ता हुआ बच्चा स्वतंत्र है, लेकिन केवल मैदान की सीमा के भीतर। सीमा उसकी स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करती; बल्कि वही उस क्षेत्र को निर्धारित करती है जिसमें उसकी स्वतंत्रता काम करती है।

जब हम एक पैर उठाते हैं, तो दूसरे को धरती पर रखना ही पड़ता है।

अतः स्वतंत्रता की सीमा का अभाव नहीं है। स्वतंत्रता सीमा के भीतर गति है।

मानव स्वतंत्रता को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है।

एक खूंटे से बँधी गाय एक निश्चित सीमा के भीतर चरने के लिए स्वतंत्र होती है, लेकिन उस सीमा से आगे नहीं जा सकती। मनुष्य के लिए, हालांकि, यह बंधन कुछ अलग प्रकार का है। उसकी रस्सी मानो लोचदार हैनिरंतर प्रयास के द्वारा उसकी प्रभावी लंबाई धीरे-धीरे बढ़ सकती है और उसके कर्मक्षेत्र का विस्तार हो सकता है।

फिर भी, परिस्थिति का एक दूसरा पक्ष भी है। शाम हो सकती है और मालिक गाय को किसी दूसरी जगह ले जा सकता है। अथवा ऋतु बदल सकती है और जिस स्थान पर वह चर रही थी, वहाँ की घास सूख सकती है। उस समय परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, जरूरी नहीं कि गाय ने स्वयं कुछ किया हो। इस उपमा में यही प्रारब्धअर्थात् नियतिहै।

इसलिए कर्म और प्रारब्ध के संबंध को केवलहाँयानहींमें व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य का पुरुषार्थ परिस्थितियों के भीतर कार्य करता है, लेकिन वही पुरुषार्थ उन परिस्थितियों को भी बदल सकता है जिनमें उसके आगे के कर्म घटित होते हैं। दूसरी ओर, परिस्थितियाँ भी उसके तत्काप्रयासों प्रयास से स्वतंत्र रूप से बदल सकती हैं।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य पूर्णतः स्वतंत्र है या पूर्णतः बंधा हुआ। प्रश्न यह है कि कर्म और प्रारब्ध किस प्रकार निरंतर एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हुए उस क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जिसके भीतर मनुष्य की स्वतंत्रता कार्य करती है।

4. कर्म और नियति की संरचना

भगवद्गीता कहती है

गहना कर्मणो गतिः।

gahanā karmaṇo gatiḥ

कर्म की गति अत्यंत गहन है।

भगवद्गीता 4.17

कर्म को केवल ईश्वर द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार और दंड के रूप में समझना आवश्यक नहीं है। उसके एक अधिक गहरे अर्थ को कारणात्मक निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है।

हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक संकल्प और प्रत्येक कर्म मन पर एक छाप छोड़ता है। ये छापें बार-बार दोहराए जाने पर प्रवृत्तियों का रूप लेती हैं। प्रवृत्तियाँ आगे आने वाले निर्णयों को प्रभावित करती हैं। निर्णय परिणाम उत्पन्न करते हैं और वे परिणाम फिर उन परिस्थितियों का हिस्सा बन जाते हैं जिनके भीतर हमारे अगले निर्णय जन्म लेते हैं।

इस प्रकार अतीत केवल समाप्त होकर कहीं चला नहीं जाता।

वह अपने द्वारा निर्मित संरचना के माध्यम से वर्तमान में कार्य करता रहता है।

इस अर्थ में

नियति उस कारण-श्रृंखला का परिणाम है जिसे पहले ही गति दी जा चुकी है।

प्रयास वह है जिसे इस क्षण गति दी जा रही है।

और भविष्य की परिस्थितियाँ आंशिक रूप से उसी वर्तमान प्रयास से निर्मित होती हैं।

इसलिए नियति और स्वतंत्र इच्छा के बीच का विभाजन पूर्ण नहीं है।

जिसे हम नियति कहते हैं, वह कारण-व्यवस्था का वह भाग है जो पहले ही परिपक्व होकर हमारे सामने चुका है।

और जिसे हम प्रयास कहते हैं, वह उन कारणों के निर्माण में हमारी वर्तमान सहभागिता है जिनके परिणाम आगे प्रकट होंगे।

पारंपरिक वेदान्त में प्रारब्ध कर्म  उस कर्मफल के उस भाग को कहा गया है जिसके परिणामों का unfold होना आरंभ हो चुका है। वह वर्तमान जीवन की प्रारंभिक परिस्थितियों को निर्धारित करता है; किंतु उन्हीं परिस्थितियों के भीतर कर्म करने के लिए एक सापेक्ष क्षेत्र फिर भी उपलब्ध रहता है।

इसलिए कर्म स्वतंत्रता का निषेध नहीं करता।

वह केवल उस क्षेत्र की सीमाएँ निर्धारित करता है जिसके भीतर सापेक्ष स्वतंत्रता कार्य करती है।

5. पूर्ण स्वतंत्र इच्छा का भ्रम

हम अपने दैनिक जीवन में स्वयं को स्वतंत्र कर्ता के रूप में अनुभव करते हैं

मैंने निर्णय लिया। मैने चुना। मैंने कार्य किया।

लेकिन क्या वास्तव में इस पूरी प्रक्रिया पर हमारा उतना ही सचेत नियंत्रण है जितना हम मानते हैं?

एक विचार अचानक उपस्थित होता है। एक आवेग उठता है। एक इच्छा जन्म लेती है।

और अनेक बार उसके बाद चेतन मन उस निर्णय के समर्थन में एक तर्क गढ़ता हैमानो निर्णय हमने अभी लिया हो।

आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान ने भी अचेतन तंत्रिका-प्रक्रियाओं और सचेत निर्णय-निर्माण के बीच संबंध को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

ध्यान हमें इस प्रश्न को देखने का एक दूसरा मार्ग देता है।

जब हम मन को पर्याप्त सजगता के साथ देखते हैं, तो कभी-कभी यह दिखाई देने लगता है कि विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ, आवेग और संकल्प उस अनुभूति से पहले ही उत्पन्न हो जाते हैं जिसे हम बाद में कहते हैं

मैं इन्हें उत्पन्न कर रहा हूँ।

यह इस बात का प्रमाण नहीं कि स्वतंत्र इच्छा का अस्तित्व ही नहीं है। बल्कि यह एक अधिक सूक्ष्म संभावना की ओर संकेत करता है

व्यक्तिगत अहंकार स्वयं को जितना स्वायत्त कर्ता समझता है, संभवतः वह उतना स्वायत्त कर्ता नहीं है।

हमारे निर्णयों के पीछे कारणों का एक विशाल जाल कार्य करता हैआनुवंशिक संरचना, पालन-पोषण, स्मृतियाँ, आदतें, पर्यावरण, इच्छाएँ, भय, ज्ञान और संचित प्रवृत्तियाँ।

ऐसी स्थिति में पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्र इच्छा की धारणा का बचाव करना कठिन हो जाता है।

लेकिन इसके विपरीत, पूर्ण नियतिवाद भी मानव अनुभव को पूरी तरह समझा नहीं सकता। क्योंकि हमारा सचेत प्रयास स्वयं उन कारणों का हिस्सा बन जाता है जो आगे की घटनाओं को आकार देते हैं।

इसलिए अधिक तर्कसंगत निष्कर्ष शायद यह है

हम कारणों से बंधी हुई व्यवस्था के भीतर सापेक्ष रूप से स्वतंत्र हैं।

जब हम एक पैर उठाते हैं, तो दूसरा धरती पर रहना ही चाहिए। स्वतंत्रता सीमा का अभाव नहीं; वह सीमा के भीतर गति है।

फिर भी चेतना के विकास के साथ एक परिवर्तन संभव है। व्यक्ति धीरे-धीरे इन सीमाओं को अपने विरुद्ध किसी शक्ति के रूप में अनुभव करना बंद कर सकता है।

जन्म-जन्मांतर में चेतनाशरीर से संबद्ध जीवअपनी यात्रा जारी रखती है। उसकी व्यक्तिगत इच्छा धीरे-धीरे ब्रह्मांड की व्यापक व्यवस्था के साथ अधिकाधिक सामंजस्य में आती जाती है।

एक अवस्था ऐसी भी हो सकती है जहाँ व्यक्ति सोचता और कार्य करता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन उसके विचार और कर्म जीवन द्वारा उसके सामने खोले जा रहे मार्ग के साथ सहज रूप से एकरूप होते जाते हैं।

बाहरी दृष्टि से ऐसे व्यक्ति असाधारण रूप से सफल दिखाई दे सकते हैं, क्योंकि उनका व्यक्तिगत प्रयास और जीवन की व्यापक गति एक ही दिशा में प्रवाहित होते हुए दिखाई देती है।

6. समय और व्यक्तिगत पहचान से परे

अब इससे भी गहरा प्रश्न उठता है।

यदि चेतना मूलभूत है और व्यक्ति पूर्णतः स्वतंत्र सत्ता नहीं है, तो अंततः एक क्षण दूसरे क्षण से और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग कैसे है?

यह हमें समय के प्रश्न तक ले आता है।

हम सामान्यतः वास्तविकता को एक ऐसी यात्रा के रूप में देखते हैं जिसमें भविष्य धीरे-धीरे वर्तमान बनता है और वर्तमान अतीत में बदल जाता है।

लेकिन इस धारणा में एक पूर्वमान्यता छिपी हुई है

कि समय स्वयं स्वतंत्र रूप से अस्तित्व रखता है।

अद्वैत के दृष्टिकोण से समय अनुभव और अभिव्यक्ति के क्षेत्र का अंग है। परम वास्तविकता समय के भीतर स्थित नहीं है।

भूत, वर्तमान और भविष्यये हमारे कालगत अनुभव के भीतर निर्मित विभाजन हैं।

इसलिए घटनाओं का जो क्रम हमें दिखाई देता है, वह संभवतः चेतना द्वारा अभिव्यक्ति को अनुभव करने की एक विधि है; यह आवश्यक नहीं कि वही वास्तविकता का अंतिम स्वरूप हो।

और यदि ऐसा है, तो इसका परिणाम अत्यंत गहरा है।

यदि व्यक्तिगत आत्मा भी व्यापक वास्तविकता के भीतर एक अभिव्यक्ति मात्र है, तो एक पृथक व्यक्ति का किसी पृथक लक्ष्य की ओर बढ़ने का विचार भी प्रश्नों के घेरे में जाता है।

तब मोक्ष का अर्थ किसी ऐसी वस्तु को प्राप्त करना नहीं रह जाता जो अभी हमारे पास नहीं है।

मोक्ष शायद उस सत्य को पहचान लेना है जो कभी अनुपस्थित था ही नहीं।

साधक को अंततः यह अनुभूति हो सकती है कि जिसकी खोज वह इतने समय से कर रहा था, वह वास्तव में कभी उससे दूर था ही नहीं।

7. ज्योतिष और अंतर्संबद्धता

यह दृष्टिकोण ज्योतिष के लिए भी एक रोचक दार्शनिक आधार प्रस्तुत करता है।

ज्योतिष को आवश्यक रूप से ऐसी व्यवस्था मानना जरूरी नहीं है जिसमें दूर स्थित ग्रह किसी यांत्रिक शक्ति द्वारा मनुष्य को किसी विशेष घटना की ओर धकेलते हैं। ऐसी व्याख्या के लिए एक भौतिक तंत्र की आवश्यकता होगी, जो अभी स्थापित नहीं हुआ है।

लेकिन एक दूसरी व्याख्या संभव है।

यदि ब्रह्मांड मूलतः परस्पर संबद्ध है, तो आकाशीय विन्यास और पृथ्वी पर घटित होने वाली घटनाएँ एक ही अंतर्निहित व्यवस्था की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं।

इस अर्थ में

ज्योतिष यांत्रिक बल को नहीं, बल्कि सामंजस्य (resonance) को पढ़ता है।

कुंडली घटना को उत्पन्न नहीं करती।

वह उस प्रतिरूप का प्रतिनिधित्व करती है जो किसी व्यक्ति अथवा किसी विशेष स्थान और समय में घटित हो रहे प्रतिरूप के अनुरूप है।

इसलिए ग्रहों की स्थिति और पृथ्वी पर घटित होने वाली घटना का संबंध आवश्यक रूप से कारण और परिणाम का संबंध नहीं होना चाहिए।

वे दोनों एक ही एकीकृत व्यवस्था की अनुरूप अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं।

प्राचीन भारतीय दृष्टि में व्यक्त यह वाक्य

ईशावास्यमिदं सर्वं

īśāvāsyam idaṁ sarvam

—“परम सत्ता इस सबमें व्याप्त है”—

ऐसी अनुरूपता को समझने के लिए एक दार्शनिक आधार प्रदान करता है।

यदि सब कुछ एक ही मूलभूत वास्तविकता से संबंधित है, तो आकाश और पृथ्वी, व्यक्ति और ब्रह्मांड, पर्यवेक्षक और पर्यवेक्षित के बीच कोई पूर्ण विभाजन नहीं रह जाता।

इस दृष्टि में ज्योतिष नियति का निर्माण नहीं करता।

वह उस संरचनात्मक अनुरूपता को पढ़ने का प्रयास करता है जो पहले से विद्यमान है।

अतः ग्रह सामान्य यांत्रिक अर्थ में किसी घटना केकारणनहीं हैं। ग्रहों की स्थिति उस व्यापक प्रतिरूप की ओर संकेत करती है जिसका एक हिस्सा ग्रह है और दूसरा हिस्सा वह घटना जिसे हम पृथ्वी पर अनुभव करते हैं।

8. नियति, स्वतंत्रता और सामंजस्य

यदि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सापेक्ष है, तो फिर स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप क्या है?

शायद स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप अपनी व्यक्तिगत इच्छा को वास्तविकता पर थोप देना नहीं है।

शायद वह उस संघर्ष का धीरे-धीरे समाप्त हो जाना है जो व्यक्ति की इच्छा और व्यापक व्यवस्था के बीच बना रहता है।

एक बच्चा प्रारंभ में अपनी माँ के निर्देश को प्रतिबंध के रूप में देखता है। जैसे-जैसे उसकी समझ विकसित होती है, वह उस निर्देश के पीछे छिपी मंशा को समझने लगता है।

तब जो पहले प्रतिबंध था, वही मार्गदर्शन बन जाता है।

आध्यात्मिक विकास में भी कुछ ऐसा ही घटित हो सकता है।

आरंभ में व्यक्ति कहता है

मैं चाहता हूँ कि वास्तविकता मेरी इच्छा के अनुसार हो।

लेकिन समझ गहरी होने पर उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है

मेरी इच्छा वास्तविकता के अनुरूप हो जाए।

और शायद सबसे गहरे स्तर पर पहुँचकर मेरी इच्छा और परम इच्छा के बीच का अंतर भी समाप्त हो जाए।

यह निष्क्रिय समर्पण नहीं है।

यह स्वयं को कर्ता मानने की अनुभूति में परिवर्तन है।

9. स्वतंत्रता की संरचना

इस प्रकार हम एक ऐसे प्रतीत होने वाले विरोधाभास के सामने पहुँचते हैं जिसे एक ही दृष्टि से हल नहीं किया जा सकता।

हम तो पूर्णतः स्वतंत्र हैं और पूर्णतः नियत।

सापेक्ष स्तर पर हम ऐसे सशर्त प्राणी हैं जो जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, परिस्थितियों और कर्म से निर्मित एक संरचना के भीतर कार्य करते हैं।

फिर भी उसी संरचना के भीतर हमारा प्रयास अर्थहीन नहीं है, क्योंकि वर्तमान प्रयास स्वयं उन कारणों का हिस्सा बन जाता है जो आगे आने वाले परिणामों को आकार देते हैं।

लेकिन परम स्तर पर वह पृथक व्यक्ति, जो स्वयं को पूर्ण कर्ता मानता है, स्वयं उसी व्यापक अभिव्यक्ति का एक अंश है।

इसलिए

पूर्ण स्वतंत्र इच्छा विलीन हो जाती है।

पूर्ण नियतिवाद भी विलीन हो जाता है।

जो शेष रहता है, वह एकीकृत वास्तविकता के भीतर घटित होने वाला सुव्यवस्थित unfolding है।

ज्योतिष, ध्यान और दर्शनतीनों इस सत्य की ओर अलग-अलग दिशाओं से संकेत करते हैं।

ज्योतिष ब्रह्मांडीय प्रतिरूपों और स्थलीय अनुभवों के बीच की अनुरूपता को देखता है।

ध्यान भीतर की ओर लौटकर विचारों, इच्छाओं और व्यक्तिगत कर्तृत्व की अनुभूति के उदय को देखता है।

दर्शन उन मूल धारणाओं पर प्रश्न करता है जिनके आधार पर हम देखने वाले और देखी जाने वाली वस्तुदोनों को अलग-अलग मानते हैं।

और अंततः तीनों हमें एक ही प्रश्न के सामने खड़ा कर देते हैं

वह व्यक्ति कौन है जो इस ब्रह्मांड के भीतर स्वतंत्र रूप से कार्य करने का दावा करता है?

शायद इस प्रश्न का सबसे गहरा उत्तर यह है कि व्यक्ति किसी बाहरी ब्रह्मांड में यात्रा करता हुआ कोई पृथक कर्ता नहीं है।

व्यक्ति स्वयं ब्रह्मांड का एक स्थानीय रूप में प्रकट होना है।

और जब व्यक्ति और समग्रता के बीच दिखाई देने वाला विभाजन धीरे-धीरे विलीन होने लगता है, तब स्वतंत्रता का अर्थ ब्रह्मांड को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की शक्ति नहीं रह जाता।

स्वतंत्रता तब अपने स्थान को समग्रता में पहचान लेने की स्वतंत्रता बन जाती है।

मौन में यह केवल एक सिद्धांत नहीं रह जाता।

यह एक अनुभव बन सकता है।

——✍️ राघवेन्द्र खरे

 

 

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