पुराणों की प्रतीकात्मक भाषा को समझना
पुराणों को पढ़ते समय हमारे सामने आने वाली एक कठिनाई यह है कि हम प्रायः उन्हें इतिहास और तथ्य की आधुनिक कसौटी पर देखने लगते हैं। यदि किसी एक ग्रंथ में कोई कथा एक प्रकार से कही गई हो और दूसरे ग्रंथ में उसी कथा का स्वरूप कुछ भिन्न हो,
तो हमारा पहला प्रश्न होता है—सही कौन-सा है? यदि एक पुराण किसी घटना को एक प्रकार से बताता है और दूसरा उसी घटना का कोई दूसरा विवरण देता है,
तो हम सहज ही इस निष्कर्ष की ओर बढ़ते हैं कि दोनों में से किसी एक का विवरण गलत होना चाहिए।
लेकिन संभव है कि समस्या प्रश्न में ही हो।
संभव है कि पुराणों का उद्देश्य हर बार घटनाओं का वर्णन उस प्रकार करना न रहा हो, जिस प्रकार कोई आधुनिक इतिहासकार किसी घटना का वर्णन करता है। संभव है कि अनेक प्रसंगों में उनका उद्देश्य कुछ मूलतः भिन्न रहा हो। उन्होंने कथा को अभिव्यक्ति की एक भाषा के रूप में प्रयुक्त किया हो।
यदि ऐसा है, तो दो कथाएँ, जो ऊपर से एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देती हैं, आवश्यक नहीं कि परस्पर विरोधी हों। संभव है कि वे कथा के भीतर निहित किसी गहरे सत्य को व्यक्त करने के दो अलग-अलग तरीके हों।